लोकपाल OMBUDSMAN
लोकपाल OMBUDSMAN
लोकपाल का अर्थ
[MEANING OF OMBUDSMAN]
ओंबड्समैन की परिभाषा करना
कठिन है यह संसद के एक ऐसे अधिकारी के रूप में कार्य करता है जिसका प्रमुख कार्य
संसद के अभिकर्ता के रूप में कार्य करते हुए नागरिकों को
कार्यपालिका द्वारा प्रशासनिक शक्ति के
दुरुपयोग के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करना है
ओम्बड्समैन एक ऐसी संस्था
का बोध कराता है जिसमें मूलतः तीन प्रधान लक्षण है
1.
वह विधायिका का एक स्वतंत्र और निर्दलीय
प्राधिकारी होता है जो प्रशासन का पर्यवेक्षण करता है
2.
वह शासकीय अन्याय तथा प्रशासन के विरुद्ध जनता की
शिकायतें सुनता है तथा उसकी छानबीन करता है।
3. उसे
जांच आलोचना तथा विधायिका की रिपोर्ट प्रेषित करने का अधिकार होता है किंतु
प्रशासकीय के कृत्यों को उलट देने का
अधिकार नहीं होता है
उपयोगिता
की दृष्टि से ओंबड्समैन को प्रशासन का प्रहरी या साधारण व्यक्ति का संरक्षक कहते
हैं
विकास
[DEVELOPMENT]
इसकी उत्पत्ति जानने के लिए
हमें इतिहास के पन्नों का अवलोकन करना पड़ेगा जब हम यूरोप की राजनीतिक स्थिति का
अवलोकन करते हैं तो देखते हैं कि जनता निरंकुश शासन से त्रस्त थी उस शासन के
दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे निरंकुश शासक जनता को केवल मरा हुआ पशु समझकर व्यवहार
कर रहे थे कुछ देशों में क्रांति हुई जिसका उद्देश्य था प्रशासनिक दुर्गुणों का
नाश करना। सन 1809 में
सर्वप्रथम स्वीडेन में इसके लिए प्रयास किया गया था। सबसे पहले सम्राट के विरुद्ध
फिर प्रशासन के विरुद्ध आवाज उठाई गई इसी का अनुसरण 1920
में फिनलैंड में, 1955 में
डेनमार्क में तथा 1962 में
नॉर्वे और न्यूजीलैंड में किया गया। इस प्रक्रिया का नाम था ओंबड्समैन जिसका
शाब्दिक अर्थ प्रतिनिधि होता है प्रोफेसर रावत ने ठीक ही कहा है कि ओंबड्समैन अथवा
इसके समकक्ष की कोई ना कोई संस्था समस्त विश्व के प्रजातांत्रिक शासन का एक
महत्वपूर्ण उपकरण हो जाएगी।
भारत में लोकपाल
भारत में ओंबड्समैन की
उपयोगिता उसी प्रकार से है जैसे कि अन्य देशों को है भारत में एम. सी. सीतलवाड़ ने 1962
में प्रथम बार ऐसी संस्था का जिक्र किया। प्रशासनिक
सुधार आयोग ने ओंबड्समैन जैसी संस्था लोकपाल एवं लोकायुक्त संस्था के निर्माण की
स्थापना की सिफारिश की है. भारत सरकार आयोग की सिफारिश मान कर 1969
में लोकपाल तथा लोकायुक्त विधेयक,
1968 पेश किया। परंतु यह प्रयास विफल हो
गया। दूसरी बार 1971
में
फिर से प्रयास किया गया परंतु यह भी असफल रहा। जनता पार्टी की सरकार ने 1977
में फिर लोकपाल विधेयक, 1977 संसद में प्रस्तुत किया परंतु वह भी पास न हो सका,
1985 में फिर से एक बार इसे पुनः
स्थापित किया गया, जो
कि असफल ही रहा. 1989 में
फिर से एक बार प्रयास किया गया परंतु वह प्रयास भी इस बिल को संसद में पास न करा
स्का। 1996 और 1998
में भी लोकपाल बिल लोकसभा में पेश किए गए परंतु यह
पारित नहीं हो सके। फिर
तब से लेकर सन 2011 तक 8 बार इस बिल को पास किये जाने के बारे में बात होती रही.
किन्तु जनता को इसके बारे में सही से जानकारी नहीं होने की वजह से इसे पास नहीं
किया गया और सरकार द्वारा भी अधिक महत्वता नहीं दी गई. सन 2002
में बात उठी, की
लोकपाल बिल पास होना चाहिए और इसमें प्रधानमंत्री को इससे दूर रहना चाहिये, क्योंकि उनके ऊपर काफी सारी जिम्मेदारी होती है. सन 2005
में फिर से इसे पेश किये जाने के बारे में बात की गई, किन्तु इस बार भी इस बिल को पास नहीं किया जा सका.
सन 2011 में, सरकार ने प्रणब मुखर्जी जी की अध्यक्षता में मंत्रियों
के एक समूह का गठन किया. उसमे यह चर्चा हुई, कि
किस तरह से भ्रष्टाचार से निपटा जा सकता है. और तभी से इस बिल को पास करने के बारे
में बेहतर तरीके से चर्चाएँ शुरू हो गई. इसमें भारत के एक समाज सुधारक एवं
कार्यकर्ता अन्ना हजारे जी का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने आन्दोलन कर जन लोकपाल बिल
पास करने के लिए भारत की सरकार के ऊपर दबाव डाला.
लोकपाल बिल को सन 2013 में लोकपाल और लोकायुक्त, दोनों के रूप में संसद के दोनों सदनों में पास कराया
गया. इसके बाद सन 2016 में
लोकसभा ने लोकपाल अधिनियम में संशोधन करने पर सहमति व्यक्त की और इस बिल की
समीक्षा के लिए इसे एक स्टैंडिंग कमिटी के पास भेजा गया. इस बिल के पास होने के 6 साल बाद यदि इस साल 2019 को जाकर भारत में पहला लोकपाल नियुक्त हुआ. नियुक्त
किये गए लोकपाल का कार्यकाल आने वाले 5
सालों तक के लिए रहेगा.
इस तरह से भारत में लोकपाल बिल को मंजूरी मिली एवं पहले लोकपाल की नियुक्ति की गई. भारत में में मार्च 2019 में पहले लोकपाल अध्यक्ष की घोषणा की गई है. भारत के पहले लोकपाल सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष जी है.
लोकपाल
और लोकायुक्त अिधिनयम, 2013 मुख्य विशेषताएं
[SILENT
FEATURES OF Lokpal and Lokayukta Act, 2013]
भ्रष्टाचार
के विरोध में पास किये गए इस बिल में यह बताया गया है, कि केंद्रीय स्तर पर इसके लिए लोकपाल नियुक्त
होंगे और राज्य स्तर पर इसके लिए लोकायुक्ता की नियुक्ति होगी.
राज्य
स्तर में राज्यों को इस अधिनियम के शुरूआत में एक साल के अंदर लोकायुक्त का गठन
करना होता है.
लोकपाल
द्वारा संदर्भित मामलों में परिक्षण करने के लिए विशेष अदालतों का गठन किया
जायेगा.
लोकपाल
प्रधानमंत्री सहित सभी प्रकार के लोक सेवकों को कवर करता है. यदि उन्हें पता लगता
है, कि उनके खिलाफ कहीं पर भ्रष्टाचार हो
रहा है, तो लोकपाल इसके लिए अपनी जाँच शुरू
कर सकते हैं. इसके लिए भले ही अन्य एजेंसी द्वारा जाँच की जा रही हो, फिर भी वे खुद से अपनी तरफ से जाँच शुरू कर सकते
है. सशस्त्र बल लोकपाल के दायरे में नहीं आते हैं.
हालांकि
लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री जी को कुछ छूट दी गई है. दरअसल जब प्रधानमंत्री के
ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है, तो
लोकपाल कार्यवाही कर सकते हैं, लेकिन
इसके लिए लोकपाल के अन्य 8
सदस्यों की सहमति भी होना आवश्यक होती है. इसमें एक चीज यह भी है, कि कुछ चीजों में लोकपाल प्रधानमंत्री जी को
इसमें शामिल नहीं कर सकते हैं, जैसे
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों से जुड़े मामलों में, आंतरिक या बाहरी सुरक्षा, पब्लिक ऑर्डर, एटॉमिक
एनर्जी और स्पेस आदि में. इन सभी मामलों में प्रधानमंत्री जी को छूट दी गई है.
इससे यह समझ आता है, कि हालही में राफेल हेलीकॉप्टर का
मुद्दा सामने आ रहा हैं, तो इस
मामलें की जाँच करने की शक्ति लोकपाल के पास नहीं होगी.
इसके
अलावा यदि लोकपाल या लोकायुक्त के किसी अधिकारी के खिलाफ किसी भी शिकायत की जाँच
आती है और वह आरोप सही पाया जाता है, तो अधिकारी 2 महीने
के अंदर बर्खास्त कर दिया जाएगा.
लोकपाल
बिल में यह अनिवार्य किया गया है, कि जो
भी लोक सेवक होंगे, उन्हें अपने पूरे परिवार, जमीन – जायदाद और उनकी देनदारियों की घोषणा पहले
से करनी होगी.
इस
अधिनियम में यह भी सुनिश्चित किया गया है, कि सार्वजिनक कर्मचारी जो विस्सल ब्लोअर के रूप में कार्य करते हैं, वे इसमें सुरक्षित हैं. यानि यदि कोई नागरिक का
सरकारी काम या अन्य इस तरह का कोई काम निर्धारित समय में नहीं किया जाता है, तो वह लोकपाल से इसकी शिकायत कर सकता है. जिससे
किसी भी सरकारी कार्यालय में लोकपाल दोषी अधिकारीयों पर वित्तीय जुर्माना लगा सकते
हैं और शिकायत करने वाले को यह मुआवजें के रूप में प्रदान कर सकते हैं. साथ ही
उनकी सुरक्षा का पूरा दामोदार भी लोकपाल अपने सिर लेते हैं. इस तरह से इसके लिए एक
अलग विस्सल ब्लोअर संरक्षण अधिनियम पारित किया गया है.
यदि
लोकपाल की उनके कार्यकाल के दौरान मृत्यु हो जाती है या वे अपने पद से इस्तीफा दे
देते हैं, तो उनके स्थान पर लोकपाल के सबसे
वरिष्ठ सदस्य को अगले लोकपाल की नियुक्ति तक पदभार संभालने के लिए कहा जाता है.
इसके अलावा यदि लोकपाल किसी कार्य के चलते उपस्थित नहीं होते हैं, तो उनकी अनुपस्थिति में उनकी जगह भी लोकपाल के
सबसे वरिष्ठ सदस्य को दी जाती है.
लोकपाल और लोकायुक्त अिधिनयम, 2013 के अनुसार लोकपाल एवं उसके सदस्यों के लिए पात्रता मापदंड
[Eligibility criteria for Lokpal and
its members as per Lokpal and Lokayukta Act, 2013]
लोकपाल
एक बॉडी है, जिसमें एक चेयरपर्सन यानि अध्यक्ष
होता है और इसके अलावा इसमें 8 अन्य
सदस्य भी होते हैं. लोकपाल अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों के चयन के लिए निम्न पात्रता
निर्धारित की गई है –
लोकपाल
के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए यह आवश्यक है लोकपाल या तो भारत का पूर्व
मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए या सुप्रीम कोर्ट का पूर्व न्यायाधीश होना चाहिए.
इसके
अलावा उन लोगों को भी लोकपाल का अध्यक्ष बनाया जा सकता है, जो एक निर्दोष, ईमानदार और बेहतरीन योग्यता वाले एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हो. साथ ही
उन्हें कुछ विशेष श्रेणियों में न्यूनतम 25 वर्षों का विशेष ज्ञान और उसमें विशेषज्ञता होनी भी आवश्यक है. वे
व्यक्ति लोकपाल के अध्यक्ष बनने के लिए पात्र होंगे. वे कुछ विशेष श्रेणी
भ्रष्टाचार – विरोधी नीति, सार्वजनिक
प्रशासन, सतर्कता, बीमा और बैंकिंग सहित वित्त एवं कानून और प्रबंधन
से सम्बंधित हो सकती है.
लोकपाल
के सदस्यों को 2 श्रेणी में बांटा गया है, जिनमें से 50 % न्यायिक सदस्य और 50 % सदस्य
एससी / एसटी / ओबीसी, अल्पसंख्यक
और महिलायें होती है. लोकपाल के जो न्यायिक सदस्य हैं, वह या तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश या एक
हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ही हो सकते हैं. इसके अलावा जो अन्य सदस्य हैं, उनके लिए वहीँ पात्रता मापदंड हैं, जोकि लोकपाल अध्यक्ष के लिए हैं.
एक
लोकपाल की अधिकतम उम्र 70 साल
होनी चाहिए, इससे ऊपर के किसी भी उम्मीदवार को
लोकपाल के रूप में नियुक्ति नहीं की जा सकती है.
लोकपाल के कार्य
1.
लोकपाल विधायिका का एक स्वतंत्र और निर्दलीय प्राधिकारी होता है जो प्रशासन का
पर्यवेक्षण करता है।
2 . वह
प्रशासकीय न्याय तथा प्रशासन के विरुद्ध जनता की शिकायते सुनता है तथा उसकी छानबीन
करता है।
3 . उसे
जांच आलोचना तथा विधायिका की रिपोर्ट प्रेषित करने का अधिकार होता है किंतु
प्रशासकीय कृत्यों को उलट देने का अधिकार नहीं होता है.
लोकपाल की शक्तियाँ
लोकपाल
के पास केंद्र सरकार पर उनके सार्वजनिक अधिकारीयों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों
की जाँच करने और उससे जुड़े मामलों से निपटने का अधिकार होता है.
लोकपाल
के पास सीबीआई सहित किसी भी जाँच एजेंसी का अधिकार होता है. यदि सीबीआई ने किसी
भ्रष्टाचार के आरोपी की जाँच की है और यदि उसमें कुछ गडबड लगती है, तो लोकपाल उस एजेंसी द्वारा की गई जाँच की भी
जाँच कर सकता है. साथ ही लोकपाल की अनुमति के बिना वह कहीं और स्थानांतरित नहीं हो
सकते हैं.
भ्रष्टाचार
के खिलाफ मामले में जाँच के लिए 6 महीने
की अवधि तय की गई हैं. 6 महीने
के अंदर जाँच एवं परिक्षण पूरा किया जायेगा, ताकि कोई भी भ्रष्ट राजनेता, अधिकारी या न्यायधीश को जल्द से जल्द जेल भेज दिया जाये. हालांकि
लोकपाल या लोकायुक्त एक बार में 6 महीने
के एक्स्टेंशन की अनुमति दे सकते हैं. लेकिन इस तरह के एक्सटेंशन की जरुरत के लिए
लिखित आवेदन देना होगा.
लोकपाल
के पास यह भी शक्ति होती हैं, कि यदि
उनके पास कोई गलत शिकायत आती है, जोकि
पूरी तरह से बेबुनियाद हैं, तो
लोकपाल शिकायत करने वाले व्यक्ति या संगठन पर 2 लाख रूपये तक का जुर्माना भी लगा सकते हैं.
इस
अधिनियम के तहत यदि किसी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है और प्रॉसिक्यूशन पेंडिंग है, तो उस व्यक्ति की संपत्ति को जब्त भी किया जा
सकता है.
इस तरह
से लोकपाल के पास यह सारी शक्तियां होती है. जिसका उपयोग वे भ्रष्टाचार जैसे गंभीर
मुद्दों से निपटने के लिए करते हैं.
महत्व
[ IMPORTANCE]
लोकपाल परम प्रशासक नहीं है संसदीय अधिकारी होने के कारण नौकरशाही के रूप से
स्वतंत्र होता है इसकी सत्ता से प्रशासनिक सख्ती के दुरुपयोग का भय कम हो जाता है
उनकी उपस्थिति मात्र प्रशासन पर शक्ति के उपयोग के संदर्भ में निरोधात्मक प्रभाव डालती
है
इस प्रकार यह निष्कर्ष
निकलता है कि भारत में लोकपाल जैसी संस्था की स्थापना से देश का हित होगा। लोकपाल आधुनिक राज्य की अनिवार्यता है प्रशासन
को साफ सुथरा बनाना इसका प्रयोजन है।
लोकतंत्र में राज्य के अधिकारों की एक सापेक्ष सीमा रहती है तथा सरकार के
मनमाने पन के विरुद्ध संरक्षण उपलब्ध रहता है।
लोकपाल जैसी संस्था इसे और उच्च स्तरीय बना रही
है और उसकी नियुक्ति का प्रशासन में
विशिष्ट योगदान हो रहा है



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