भारतीय धर्मशास्त्र में पर्यावरण की अवधारणा
भारतीय धर्मशास्त्र में पर्यावरण की अवधारणा
आदि मानव प्रकति के अन्य जीवों की तरह अपने को प्रकति की अंग मानता था व है भी यह संसार प्रत्येक जीव मात्र को जीने का उतना ही अधिकार देता है जितना एक मनुष्य को - मानव को , किन्तु कालांतर में मनुष्य ने यह सोचना आरंभ कर दिया की वह संसार के अन्य जीव प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है |
मानव की इसी स्वार्थी भावना ने पर्यावरण संकट की जन्म दिया जिसका परिणाम आज मानव जीवन ही संकट में पड़ गया, भविष्य में मानव को जीवन जीने के लिए शायद ही पर्याप्त पानी, वायु, आदि मिल सके |
भारत जैसे विकासशील देश में पर्यावरण प्रदूषण गरीबी के कारण है, जबकि विकसित देशों में पर्यावरण प्रदूषण अमीरी के कारण है | हमने गरीबी दूर करने के लिए औद्योगिक विकास का रास्ता अपनाया, क्योंकि गरीबी दूर करने के लिए इसके अलावा अन्य कोई उपाय नहीं था, अग्रसर होने के लिए भारत को अनेक प्रकार की गंभीर समस्याओं और परस्थितियो से जूझना पड़ा |
इसके कारण भारत की विधि का शासन प्रणाली में पर्यावरण विधि के विकास को आर्थिक विकास एवं पोषणीय विकास में समन्वय स्थापित करना अत्यंत आवश्यक था | विधि वहाँ बेहतर पर्यावरण का साधन व साध्य बन जाती, जहाँ तथ्य विधि शासित समाज का एक प्रतिनिधि के रूप में हो ।
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प्राचीन भारत में पर्यावरण संरक्षण लोगों की दिनचर्या का एक अंग था, जहाँ वह कला, संस्कृति, धर्म, लोक परम्परा में प्रतिबिंबित होता था | हिन्दू एवं मुस्लिम धर्म ग्रंथों में पर्यावरण संरक्षण एक परमार्थ विद्या के रूप में स्वीकार किया गया | धर्मशास्त्रों में पेड़ों, नदियों, व आराधनाओं को धार्मिक कृत्य एवं संस्कार माना गया जैसे -
1 . ऋगवेद - ऋग्वेद में प्रकति की शक्ति की जलवायु के निंयत्रण, उर्वरता में वृद्धि तथा मनुष्य के विकास व उनकी अंतरंग नातेदारी के लिए महत्वपूर्ण माना गया है | ऋग्वेद में प्रकति प्रदत्त वस्तुओं के महत्व का विवरण दिया गया है | जिसमे पर्यावरण को संरक्षण मिलता है |
2 .अथर्ववेद -अथर्ववेद में पेड़ों को विभिन्न देवी-देवताओ के निवास का स्थान माना गया है |
3 .यजुर्वेद - यजुर्वेद में जानवरों एवं प्रकृति के साथ मनुष्य को पारस्परिक सम्बन्ध प्रभुत्व और अधीनता वाले न मानकर आदर एवं दयालुता के रूप में मन गया है | महाभारत में कहा गया है कि आम के पेड़ में पानी देने से हमारे पूर्वज प्रसन्न होते हैं, विष्णु धर्म पुराण में कहा गया है कि तुम वृक्ष रोपते हो तो वह अगली पीढ़ी में तुम्हारा पुत्र होगा |
इसी प्रकार से मुस्लिम धर्म में निम्न बातें पर्यावरण संरक्ष्ण को प्रतिपादित करती हैं |
(1 ). व्यर्थ में किसी का खून मत बहाओ किसी चीज को ख़त्म मत करो | (2 ). हमने कुछ चीजें आप पर हलाल की हैं तो कुछ चीजें हराम की हैं | हलाल चीजों को भी उतना ही काम में लो जो जितना जरूरी है अनावश्यक खर्च मत करो | (3 ). क़यामत के दिन खुदा तुमसे हिसाब पूछेगा जिसमे हवा पानी भी शामिल है |
इस प्रकार से इस्लाम 'हम' का मजहब है | एक व्यक्ति का नहीं अतः इसमें परोपकार पर विशेष ध्यान दिया गया है | शरीर के लिए नहीं आत्मा के लिए जिओ, यही अंतिम लक्ष्य है | इसी प्रकार से जैन धर्म में 'जिओ और जीने दो ' का सिद्धांत प्रख्यात है | विश्व के सभी धर्म इसी सिद्धांत को मान्य करते आ रहे हैं |
इस प्रकार से हम देखते हैं कि धर्म एवं आध्यात्म भी पर्यावरण को संरक्षित करने हेतु प्रेरित करता है व इस बात का समर्थन भी करता है कि जलवायु पर्यावरण का विनाश मानव जाति का विनाश होगा | पर्यावरण की तुलना समता प्रकृति से की जाती है जिसके अंतर्गत पृथ्वी जल वायु व आकाश है जो समस्त चर अचर जीवों के आधार हैं | भारतीय आध्यत्म में प्रकृति विष्णुमय है, भगवान विष्णु ही मानव जाति के पालक हैं |
जले विष्णुः स्थले विष्णु, विष्णु पर्वत मस्तके |
ज्वलमाला कुले विष्णुः, सर्व विष्णु मयं जगत ||
जल रूप विष्णु है, पृथ्वी रूप विष्णु है, पहाड़ का मस्तक विष्णु हैं, अग्नि में विष्णु हैं , सारा जगत विष्णु मय है अर्थात संसार का पालनकर्ता विष्णु हैं | इस प्रकार से पर्यावरण की रक्षा करना धर्म था क्योंकि धर्मः रक्षति रक्षितः | भारतीय समाज में हम प्रकृति के पदार्थों की पूजा एवं सम्मान किया करते थे क्योकि धर्मानुसार ईश्वर आत्मा में व्याप्त है |
हमारे देवी देवताओ के वाहन पशु पक्षी होते थे, जिनके कारण पशु पक्षियों का संरक्षण व पूजा अर्चना होती रही है | वर्तमान में भी माँ दुर्गा का वाहन सिंह पूज्य है, गणेश जी का वाहन चूहा पूज्य है व दीपावली पर गोवर्धन की पूजा में पशुधन की पूजा की जाती है |
भारतीय धर्मशास्त्र में यज्ञ का बड़ा महत्व था जो देवी-देवताओ की पूजा के लिए किया जाता था | यजुर्वेद के अनुसार यज्ञ में जो भी घी एवं अन्य सामग्री की आहुति दी जाती थी जिसमें घी व सामग्री सूक्ष्म कणों में विलीन होकर वायुमंडल में पहुँच कर वायु को शुद्धता प्रदान करते थे | इसी प्रकार से
4 .सामवेद- के अनुसार यज्ञ की अग्नि से मच्छर व अन्य कीटाणु, किट पतंगे दूर हो जाते थे | श्रीमद्भगवतगीता के अध्याय तीन के श्लोक में कहा गया है कि यज्ञ के अन्न से भूतों की उत्पत्ति होती है | अन्न की उत्पत्ति बादल के पानी से होती है, बादल यज्ञ से क्रियान्वित होते हैं | इसी प्रकर से मनु स्मृति में कहा गया है कि यज्ञ जैविक विकास का कारण है |
एक धर्म ग्रन्थ के अनुसार पर्यावरण संरक्षण के बारे में कुछ इस प्रकार कहा गया है -सर्वशक्तिमान भगवान शंकर संसार की समस्त वस्तुओ में विद्यमान हैं अतः हमारा दृष्टिकोण प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की ओर सहष्णुता भाई चारे का होना चाहिए स्वार्थ एवं लोभ का परित्याग कर प्राकृतिक संसाधनों का सरंक्षण किया जाना चाहिए | इस प्रकार से भारत के धर्म ग्रंथो में पर्यावरण के संरक्षण की चिंता ईशा से पूर्व 321 और 300 के बीच में भी उठी थी |
इस सम्बन्ध में प्राचीन भारतीय विधि एवं अर्थशास्त्र के विद्वान कौटिल्य के द्वारा रचित अर्थशास्त्र में चरणवद्ध तरीके से पर्यावरण का संरक्षण किया गया जिसके अनुसार काटकर गिराये गए पेड़ो के बारे में दण्ड की मात्रा पेड़ की उपयोगिता एवं उम्र के अनुपात में दण्ड दिए जाने का प्रावधान किया गया था | इस प्रकार से हम देखते हैं कि मनुष्य जबसे प्रकृति व धर्म से दूर हुआ है तब से ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है |
यह एक शोध का विषय है कि हमारे धर्म ग्रन्थ व विधियॉं (प्राचीन व आधुनिक ) सदियों पर्यावरण के संरक्षण को महत्व देती रही हैं व मानव जाति को धर्म के आधार पर समझाया गया की प्राकृतिक वस्तुओं, जीव, वृक्ष, पौधों में भगवान् का वास होता है | इन्हें किसी प्रकार से नुकसान या नष्ट न करें किन्तु मनुष्य जबसे धर्म विमुख होने लगा है उसने पृथ्वी को आहत किया, जंगलो का विनाश, पहाड़ों को नष्ट किया जिसके कारण पर्यावरण संतुलन बिगड़ने लगा | तभी से मानव जाति के अस्तित्व का प्रश्न उत्पन्न हुआ है |
अतः हम कानून व धर्म को माने व पर्यावरण का संरक्षण करें ताकि हमारी आने वाली संतानें/पीढियां हमें न कोशें व इस बात का गर्व करें कि हमारे पूर्वजों ने प्राकृतिक संसाधनों का भण्डार एवं स्वस्थ वातावरण दिया है जो हमारी नैतिक परम्परागत उत्तरदायित्व का प्रतीक होगा |
डॉ आशीष श्रीवास्तव
आदि मानव प्रकति के अन्य जीवों की तरह अपने को प्रकति की अंग मानता था व है भी यह संसार प्रत्येक जीव मात्र को जीने का उतना ही अधिकार देता है जितना एक मनुष्य को - मानव को , किन्तु कालांतर में मनुष्य ने यह सोचना आरंभ कर दिया की वह संसार के अन्य जीव प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है |
मानव की इसी स्वार्थी भावना ने पर्यावरण संकट की जन्म दिया जिसका परिणाम आज मानव जीवन ही संकट में पड़ गया, भविष्य में मानव को जीवन जीने के लिए शायद ही पर्याप्त पानी, वायु, आदि मिल सके |
भारत जैसे विकासशील देश में पर्यावरण प्रदूषण गरीबी के कारण है, जबकि विकसित देशों में पर्यावरण प्रदूषण अमीरी के कारण है | हमने गरीबी दूर करने के लिए औद्योगिक विकास का रास्ता अपनाया, क्योंकि गरीबी दूर करने के लिए इसके अलावा अन्य कोई उपाय नहीं था, अग्रसर होने के लिए भारत को अनेक प्रकार की गंभीर समस्याओं और परस्थितियो से जूझना पड़ा |
इसके कारण भारत की विधि का शासन प्रणाली में पर्यावरण विधि के विकास को आर्थिक विकास एवं पोषणीय विकास में समन्वय स्थापित करना अत्यंत आवश्यक था | विधि वहाँ बेहतर पर्यावरण का साधन व साध्य बन जाती, जहाँ तथ्य विधि शासित समाज का एक प्रतिनिधि के रूप में हो ।
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प्राचीन भारत में पर्यावरण संरक्षण लोगों की दिनचर्या का एक अंग था, जहाँ वह कला, संस्कृति, धर्म, लोक परम्परा में प्रतिबिंबित होता था | हिन्दू एवं मुस्लिम धर्म ग्रंथों में पर्यावरण संरक्षण एक परमार्थ विद्या के रूप में स्वीकार किया गया | धर्मशास्त्रों में पेड़ों, नदियों, व आराधनाओं को धार्मिक कृत्य एवं संस्कार माना गया जैसे -
1 . ऋगवेद - ऋग्वेद में प्रकति की शक्ति की जलवायु के निंयत्रण, उर्वरता में वृद्धि तथा मनुष्य के विकास व उनकी अंतरंग नातेदारी के लिए महत्वपूर्ण माना गया है | ऋग्वेद में प्रकति प्रदत्त वस्तुओं के महत्व का विवरण दिया गया है | जिसमे पर्यावरण को संरक्षण मिलता है |
2 .अथर्ववेद -अथर्ववेद में पेड़ों को विभिन्न देवी-देवताओ के निवास का स्थान माना गया है |
3 .यजुर्वेद - यजुर्वेद में जानवरों एवं प्रकृति के साथ मनुष्य को पारस्परिक सम्बन्ध प्रभुत्व और अधीनता वाले न मानकर आदर एवं दयालुता के रूप में मन गया है | महाभारत में कहा गया है कि आम के पेड़ में पानी देने से हमारे पूर्वज प्रसन्न होते हैं, विष्णु धर्म पुराण में कहा गया है कि तुम वृक्ष रोपते हो तो वह अगली पीढ़ी में तुम्हारा पुत्र होगा |
इसी प्रकार से मुस्लिम धर्म में निम्न बातें पर्यावरण संरक्ष्ण को प्रतिपादित करती हैं |
(1 ). व्यर्थ में किसी का खून मत बहाओ किसी चीज को ख़त्म मत करो | (2 ). हमने कुछ चीजें आप पर हलाल की हैं तो कुछ चीजें हराम की हैं | हलाल चीजों को भी उतना ही काम में लो जो जितना जरूरी है अनावश्यक खर्च मत करो | (3 ). क़यामत के दिन खुदा तुमसे हिसाब पूछेगा जिसमे हवा पानी भी शामिल है |
इस प्रकार से इस्लाम 'हम' का मजहब है | एक व्यक्ति का नहीं अतः इसमें परोपकार पर विशेष ध्यान दिया गया है | शरीर के लिए नहीं आत्मा के लिए जिओ, यही अंतिम लक्ष्य है | इसी प्रकार से जैन धर्म में 'जिओ और जीने दो ' का सिद्धांत प्रख्यात है | विश्व के सभी धर्म इसी सिद्धांत को मान्य करते आ रहे हैं |
इस प्रकार से हम देखते हैं कि धर्म एवं आध्यात्म भी पर्यावरण को संरक्षित करने हेतु प्रेरित करता है व इस बात का समर्थन भी करता है कि जलवायु पर्यावरण का विनाश मानव जाति का विनाश होगा | पर्यावरण की तुलना समता प्रकृति से की जाती है जिसके अंतर्गत पृथ्वी जल वायु व आकाश है जो समस्त चर अचर जीवों के आधार हैं | भारतीय आध्यत्म में प्रकृति विष्णुमय है, भगवान विष्णु ही मानव जाति के पालक हैं |
जले विष्णुः स्थले विष्णु, विष्णु पर्वत मस्तके |
ज्वलमाला कुले विष्णुः, सर्व विष्णु मयं जगत ||
जल रूप विष्णु है, पृथ्वी रूप विष्णु है, पहाड़ का मस्तक विष्णु हैं, अग्नि में विष्णु हैं , सारा जगत विष्णु मय है अर्थात संसार का पालनकर्ता विष्णु हैं | इस प्रकार से पर्यावरण की रक्षा करना धर्म था क्योंकि धर्मः रक्षति रक्षितः | भारतीय समाज में हम प्रकृति के पदार्थों की पूजा एवं सम्मान किया करते थे क्योकि धर्मानुसार ईश्वर आत्मा में व्याप्त है |
हमारे देवी देवताओ के वाहन पशु पक्षी होते थे, जिनके कारण पशु पक्षियों का संरक्षण व पूजा अर्चना होती रही है | वर्तमान में भी माँ दुर्गा का वाहन सिंह पूज्य है, गणेश जी का वाहन चूहा पूज्य है व दीपावली पर गोवर्धन की पूजा में पशुधन की पूजा की जाती है |
भारतीय धर्मशास्त्र में यज्ञ का बड़ा महत्व था जो देवी-देवताओ की पूजा के लिए किया जाता था | यजुर्वेद के अनुसार यज्ञ में जो भी घी एवं अन्य सामग्री की आहुति दी जाती थी जिसमें घी व सामग्री सूक्ष्म कणों में विलीन होकर वायुमंडल में पहुँच कर वायु को शुद्धता प्रदान करते थे | इसी प्रकार से
4 .सामवेद- के अनुसार यज्ञ की अग्नि से मच्छर व अन्य कीटाणु, किट पतंगे दूर हो जाते थे | श्रीमद्भगवतगीता के अध्याय तीन के श्लोक में कहा गया है कि यज्ञ के अन्न से भूतों की उत्पत्ति होती है | अन्न की उत्पत्ति बादल के पानी से होती है, बादल यज्ञ से क्रियान्वित होते हैं | इसी प्रकर से मनु स्मृति में कहा गया है कि यज्ञ जैविक विकास का कारण है |
एक धर्म ग्रन्थ के अनुसार पर्यावरण संरक्षण के बारे में कुछ इस प्रकार कहा गया है -सर्वशक्तिमान भगवान शंकर संसार की समस्त वस्तुओ में विद्यमान हैं अतः हमारा दृष्टिकोण प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की ओर सहष्णुता भाई चारे का होना चाहिए स्वार्थ एवं लोभ का परित्याग कर प्राकृतिक संसाधनों का सरंक्षण किया जाना चाहिए | इस प्रकार से भारत के धर्म ग्रंथो में पर्यावरण के संरक्षण की चिंता ईशा से पूर्व 321 और 300 के बीच में भी उठी थी |
इस सम्बन्ध में प्राचीन भारतीय विधि एवं अर्थशास्त्र के विद्वान कौटिल्य के द्वारा रचित अर्थशास्त्र में चरणवद्ध तरीके से पर्यावरण का संरक्षण किया गया जिसके अनुसार काटकर गिराये गए पेड़ो के बारे में दण्ड की मात्रा पेड़ की उपयोगिता एवं उम्र के अनुपात में दण्ड दिए जाने का प्रावधान किया गया था | इस प्रकार से हम देखते हैं कि मनुष्य जबसे प्रकृति व धर्म से दूर हुआ है तब से ही पर्यावरण प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है |
यह एक शोध का विषय है कि हमारे धर्म ग्रन्थ व विधियॉं (प्राचीन व आधुनिक ) सदियों पर्यावरण के संरक्षण को महत्व देती रही हैं व मानव जाति को धर्म के आधार पर समझाया गया की प्राकृतिक वस्तुओं, जीव, वृक्ष, पौधों में भगवान् का वास होता है | इन्हें किसी प्रकार से नुकसान या नष्ट न करें किन्तु मनुष्य जबसे धर्म विमुख होने लगा है उसने पृथ्वी को आहत किया, जंगलो का विनाश, पहाड़ों को नष्ट किया जिसके कारण पर्यावरण संतुलन बिगड़ने लगा | तभी से मानव जाति के अस्तित्व का प्रश्न उत्पन्न हुआ है |
अतः हम कानून व धर्म को माने व पर्यावरण का संरक्षण करें ताकि हमारी आने वाली संतानें/पीढियां हमें न कोशें व इस बात का गर्व करें कि हमारे पूर्वजों ने प्राकृतिक संसाधनों का भण्डार एवं स्वस्थ वातावरण दिया है जो हमारी नैतिक परम्परागत उत्तरदायित्व का प्रतीक होगा |
।।जय हिन्द जय भारत।।
SAVE ENVIRONMENT-SAVE LIFE



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